Showing posts with label निशांत बिसेन. Show all posts
Showing posts with label निशांत बिसेन. Show all posts

Tuesday, December 21, 2010

किसानों के दर्द से कराही राजधानी








                      (फोटो साभार: दिलीप चौकसे, चंद्रेश माथुर)

रोज़ की तरह ही रविवार की रात भी सर्द झोंकों और ख़ामोशी के आग़ोश में मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल सोयी हुई थी। किसी भी आहट से बेख़बर। इधर रफ़्ता-रफ़्ता रात मुकम्मल होती जा रही थी और उधर....? उधर कोई था, जो सूरज के निकलने के साथ ही ख़ुद की ताक़त का एहसास कराने की तैयारी में जुटा था। तैयारी भी ऐसी कि बस, तारीख़ उसे हमेशा-हमेशा के लिए याद रखे।
    मध्य प्रदेश का किसान अपनी बदहाली और सरकार की अनदेखी से इस क़दर आजिज़ आ चुका है, कि उसे सरकार तक अपनी आवाज़ पहुंचाने का यही एकमात्र रास्ता नज़र आया। सुनियोजित रणनीति के तहत, रात के साये में प्रदेश के किसानों ने राजधानी में ऐसी सेंध लगाई कि अगले दिन सरकार और प्रशासन पानी मांगते दिखे। प्रदेश के मुखिया शिवराज सिंह किसान के बेटे हैं, लिहाज़ा वे ख़ुद के किसानों के ज़्यादा क़रीब होने का दावा करते हैं। ये तो नहीं पता कि वे किसानों के कितने क़रीब हैं? लेकिन हां, सूबे का किसान जब उनसे भी किसी तरह की राहत की उम्मीद खो बैठा, तो उसने ये क़दम उठा ही लिया। सात महीने की ज़बरदस्त प्लानिंग, एक-एक किसान को भरोसे में लेने के बाद भारतीय किसान संघ की अगुवाई में हज़ारों किसानों ने सरकार की ईंट से ईंट बजा दी है। पहले तो किसानों ने प्रशासन से इस बात की इजाज़त मांगी कि लगभग दस हज़ार किसानों और 150 ट्रैक्टर-ट्रॉलियों के साथ वे राजधानी में आएंगे और सरकार तक अपनी आवाज़ पहुंचाएंगे। किसान इस तरह अपनी बातों को पहले भी शिवराज सरकार तक पहुंचाते रहे हैं। हर बार नाउम्मीदी मिलने के बाद इस बार किसानों का इरादा कुछ और करने का था।
    किसानों ने जानबूझकर प्रशासन को मुग़ालते में रखा। किसानों की जानिब से महज़ छोटे-मोटे प्रदर्शन की उम्मीद लगाए बैठे प्रशासन और सरकार के होश उस वक़्त उड़ गए, जब सोमवार की सुबह राजधानी भोपाल किसानों की मुट्ठी में थी। रात के अंधेरे में किसानों ने हज़ारों की तादाद में ट्रैक्टर और ट्रॉलियां, राजधानी में घुसा दी थीं। राजधानी के सभी मुख्य रास्तों पर उन्होंने इन ट्रैक्टर और ट्रॉलियों को अड़ा दिया। राजधानी का बाहरी संपर्क बाधित करने के लिए बाहरी हिस्से में भी ऐसा ही किया। फिर क्या था, किसान हमला कर चुके थे। जानकार कहते हैं कि भोपाल में ऐसा ट्रैफिक जाम पहले कभी नहीं लगा। शहर के कई मुख्य मार्ग अब भी बंद हैं।
    दो राय नहीं, सरकार की नाक के नीचे, उसी के क़िले में सेंध लगाकर अन्नदाता ने अपनी ताक़त का एहसास करा दिया है। सरकार और प्रशासन भले ही कह रहे हैं कि किसानों ने उन्हें धोखे में रखकर ये क़दम उठाया है, लेकिन सवाल ये है कि आख़िर किसान क्यों मजबूर हुआ?
    मध्य प्रदेश में भाजपा को सत्तासीन हुए सात बरस हो गए हैं। शिवराज सिंह पांच सालों से राज्य के मुखिया हैं। दिग्विजय सरकार के सत्ताच्युत होने के पीछे किसानों की बदहाली एक बड़ा कारण थी। किसानों को बिजली नहीं मिल रही थी, फसलों की सिंचाई के लिए पानी नहीं मिल रहा था, और भी बहुत सी समस्याएं। भाजपा सत्ता में आई तो उम्मीद थी कि हालात बदलेंगे, लेकिन नहीं। कुछ नहीं बदला। गांव अब भी अपनी दुर्दशा पर रो रहे हैं। न वहां रोशनी है, न पानी। किसानों ने इस बार 183 मुद्दों को लेकर सरकार को घेरा है। बिजली दो, पानी दो के मु्द्दे को लेकर सरकार की अनदेखी ने ही उन्हें इस हल्लाबोल के लिए उकसाया। ऐसा भी नहीं कि किसान महज एक-दो दिनों के आंदोलन के इरादे से आए हैं। उनका कहना है कि जब तक उनकी बातें नहीं मान ली जातीं, वे घर नहीं जाने वाले। इसके लिए बाक़ायदा उन्होंने अपने साथ राशन-पानी का इंतज़ाम भी किया हुआ है। किसान कहते हैं कि अगर पुलिस ने उन पर लाठी चार्ज किया तो वे भी जवाब देने के लिए मजबूर होंगे।
   इस बात में भी शक़ नहीं कि किसानों के इस क़दम से राजधानी के लोगों को ज़बरदस्त मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। पहले ही जाम ने राजधानीवासियों की हालत पतली कर दी है, अब बाहरी रास्तों पर लगे जाम के कारण सप्लाई पर असर पड़ने की आशंका है। अगर ऐसा होता है तो लोगों को सब्ज़ी, दूध और दूसरी ज़रूरतों के लिए क़िल्लत का सामना करना पड़ सकता है। लोगों को हो रही असुविधा के लिए इस पूरे आंदोलन के सूत्रधार और किसान संघ के अध्यक्ष शिव कुमार शर्मा ने माफ़ी मांगी है, लेकिन साथ ही ये भी कहा है कि देश में लाखों किसान ख़ुदकुशी कर रहे हैं, लोगों को उनका दर्द समझना चाहिए। नकली बीज और खाद ने किसानों की कमर तोड़ कर रख दी है, सरकार अब सुध नहीं लेगी तो कब लेगी?
  इस पूरे आंदोलन में एक बात जो बेहद रोचक है, वो ये है कि भारतीय किसान संघ भाजपा और संघ से ही जुड़ा संगठन है। यानी अपनी ही सरकार के ख़िलाफ़ मोर्चा खोलकर संगठन ने सरकार की बोलती बंद कर दी है।
  किसान अब भी राजधानी में जमे हुए हैं। यहां कड़ाके की सर्द पड़ रही है। पारा पांच डिग्री के क़रीब है, लेकिन ये हाड़ कंपाने वाली ठंड भी किसानों के इरादों को कमज़ोर नहीं कर पा रही है। देखते हैं, खलिहानों से निकलकर राजधानी पर धावा बोलने वाले किसानों की मांगों को सरकार कितनी संजीदगी से लेती है??

Sunday, December 05, 2010

इस जनादेश के मायने...

कुछ लिखने को जी कर रहा था, विषय नहीं मिल रहा था। अचानक एक ख़बर पर नज़र पड़ी। ख़याल आया कि इस पर लिखा जा सकता है। ख़बर यूं कि उत्तर प्रदेश के बदायूं ज़िले के एक गांव में एक भिखारी ने सरपंच का चुनाव जीत लिया है। ऐसा नहीं कि 60 बरस के नारायण नट उम्मीदवारों के अभाव या किसी त्रुटि की वजह से ग्राम प्रधान बने हों, बल्कि बाक़ायदा चुनावी समर में उतरकर, ग्यारह उम्मीदवारों को पटखनी देकर उन्होंने सरपंची हासिल की है।
                 सरसरे तौर पर देखा जाए तो कोई बहुत हैरत की बात नहीं है। हर नागरिक को चुनाव लड़ने का हक़ है। नारायण नट जीत गए, उन्हें बधाई। लेकिन सरसरे तौर पर ना देखा जाए, गंभीरता से सोचा जाए तो माज़रा इतना भी सरल नहीं है। नारायण के पुरखे भी भीख मांगते थे, नारायण की पत्नी और उसके बच्चे भी भीख मांगते है, नारायण भी भीख मांगते मांगते ही ज़िंदगी का सफ़र पूरा कर रहा है। यकायक क्या हुआ, जो लोगों को नारायण में नेतृत्व क्षमता नज़र आ गई। देश भर में विकास की बात हो रही है। ऐसा क्या लगा लोगों को, जो नारायण की हाथ में कमान सौंप दी गई?
              लोग पुराने नेतृत्व से आजिज़ आ चुके हैं। सत्ता का दुरुपयोग, पद प्रदर्शन, शक्ति प्रदर्शन, भ्रष्टाचार, दबंगई, रसूख साबित करना, अपराध, नैतिक पतन, ग़ैर ज़िम्मेदाराना रवैया, राजनीतिक शुचिता का उल्लंघन सब कुछ सियासत में इस तरह रच बस गया है कि अब ना लोगों को राजनीति पर भरोसा रह गया है और ना ही राजनेताओं पर। पुराने राजनीतिज्ञ उस वट वृक्ष की तरह हैं, जो अपनी छांह में किसी को पनपने नहीं देना चाहते। दिनों दिन गंदे होते राजनीतिक परिवेश में नए लोग ख़ुद को असहज पाते हैं। अतिशयोक्ति नहीं कि बतौर करियर, राजनीति उनकी फेहरिस्त के आख़िर में भी जगह नहीं पाता होगा। जो इक्का दुक्का सियासत में आना चाहते होंगे, उन्हें ज़मीन नहीं मिल पा रही है। कुल मिलाकर नया नेतृत्व पैदा ही नहीं हो रहा है। लिहाज़ा नारायण नट जैसे लोगों को जिताकर दुनिया का सबसे वृहद् लोकतंत्र अपनी खीझ मिटाने की कोशिश कर रहा है।
     मुझे कोई बहुत ज़्यादा उम्मीद नहीं है कि नारायण जैसे जनप्रतिनिधि जनअपेक्षाओं पर खरे उतर पाएंगे। क्या होगी अगली स्टेज?? मतदाता तब तो उसे भी जिताने का साहस खो चुका होगा। कितना भयावह हो सकता है ये भटकाव, कल्पना कीजिए।
     इन दिनों देश में दो बातों का ख़ूब शोर हैं। पहली, विकास। दूसरी, भ्रष्टाचार। विकास की इसलिए, क्योंकि बिहार जैसे राज्य में ना केवल विकास मुद्दा बना, बल्कि सरकार की दोबारा सत्ता में वापसी हुई। भ्रष्टाचार का नाम इसलिए सबकी ज़ुबान पर है, क्योंकि आए दिन क्या कुछ हो रहा है, वो आप देख सुन रहे ही हैं। ऐसा नहीं कि लोगों को ये बातें सोचने पर मजबूर नहीं करतीं। लोगों में आक्रोश है, तीखी प्रतिक्रियाएं करते हैं वो। जब बहुत ग़ुस्सा आता है तो राजनीतिक पार्टियों को कोसते भी हैं। जब और ग़ुस्सा आता है तो कह देते हैं कि ‘इस देश का कुछ नहीं हो सकता’। जब उनका ग़ुस्सा बेक़ाबू हो जाता है तो इतना तक कह देते हैं कि ‘सब साले चोर हैं’। बात ख़त्म।
       मैं सोचता हूं जब बात शुरू होने को आती है तो ही क्यों पूर्णविराम लगता है। हम इतने बड़े लोकतंत्र की अगुवाई कर रहे हैं। उम्र के शुरुआती सालों में ही ‘जनता का, जनता के लिए, जनता को........’ जैसे सबक हमारे कानों में पड़ गए थे। देश तरक्की कर रहा है, लेकिन इसकी बुनियाद यानी लोकतंत्र से लोग खिलवाड़ करते जा रहे हैं, करते जा रहे हैं, करते ही जा रहे हैं... और हम चुप हैं। इंतज़ार कर रहे हैं कि पुराने लोग चले जाएंगे, जो नए आएंगे वो भले होंगे, ईमानदार होंगे। कितने बुज़दिल हैं हम?? क्यों भ्रष्टाचार और तमाम दिल को झकझोर देने वाली बातों को सुनकर भी हमारा लहू नहीं फड़कता? सियासत और डोर थामे, इसे खेल समझ बैठे चंद लोग जो चाहते हैं, वो कर लेते हैं।
     यक़ीनन जनता बदलाव चाहती है, लेकिन उसके पास विकल्प नहीं है। लिहाज़ा कमान नारायण नट को दी जा रही है। लेकिन ये स्थाई समाधान नहीं, अच्छे लोगों को आगे आना होगा। जनता को अच्छे लोगों को पहचानना होगा, नाक़ाबिलों को नकारना होगा। ऐसा नहीं है कि देश कोई बहुत मुश्किल वक़्त से गुज़र रहा है, जहां संभावनाओं का अंत निकट है। ऐसी कई खरोचों को लोकतंत्र बिना किसी मुश्किल के आसानी से सह गया है। राजनीति में आने के लिए अच्छे लोगों को प्रोत्साहित करें।।

Monday, November 29, 2010

मतदाता सम्मान हो तो बात बने


झीलों के शहर भोपाल का एक बेहद ख़ुशनुमा दिन, अमूमन इतनी भीड़ से वास्ता न रखने वाली सड़कों पर ज़बरदस्त चहलक़दमी, झंडों-बैनरों-पोस्टरों-कटआउट से अटे रास्ते, राज्य के दूरदराज से पहुंच रहे कार्यकर्ता और अपने नेता के सम्मान को लेकर उनका उत्साह। ये नज़ारा रहा, सोमवार का। मध्य प्रदेश में ग़ैर कांग्रेसी के तौर पर पांच साल पूरे करने वाले पहले मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के अभिषेक का दिन। कहने को तो ये कार्यकर्ता गौरव दिवस रहा, जहां कैडर पर पुष्प वर्षा भी हुई, लेकिन असल हीरो तो शिवराज ही रहे।
        मध्य प्रदेश में भाजपा की सत्ता के सात बरस हो गए हैं। शुरुआती दो सालों तक चली उथल पुथल के बाद शिवराज सिंह के हाथों में नेतृत्व की बागडोर सौंपते वक़्त पार्टी के आला नेताओं को भी शायद ही यक़ीन रहा हो कि वे इतने खरे साबित होंगे। राजधानी के जंबूरी मैंदान पर दो लाख से ज़्यादा कार्यकर्ताओं की मौजूदगी में पार्टी ने जमकर जश्न मनाया। शिवराज का गुणगान किया, कार्यकर्ताओं का सम्मान किया। हाल ही में बिहार चुनाव में मिली जीत, कर्नाटक का संकट टलने और तमाम आरोपों के चलते यूपीए सरकार की हो रही किरकिरी के बाद यक़ीनन भाजपा के दिग्गजों को भोपाल का ये जश्न बहुत रास आया होगा। इधर, राजधानी में ही कांग्रेस के विधायकों ने भी जमकर ड्रामा किया। मौन जुलूस, शर्म दिवस, पैदल मार्च और जाने क्या क्या?  ख़ैर, सियासी ड्रामेबाज़ी का दौर है, कोई किसी से पीछे नहीं रहना चाहता।
        2003 के आख़िर में राज्य के मतदाताओं ने दिग्विजय सिंह के नेतृत्व को किस तरह नकारा था, आपको याद होगा। बिजली का भारी संकट, बेहद ख़राब सड़कें, बिगड़ता लॉ एंड ऑर्डर, बढ़ता भ्रष्टाचार। ये वजहें थीं दिग्विजय सिंह की काग्रेस से जनता के मोहभंग की। इसके बाद भारी बहुमत से उमा जी आईं, फिर बाबूलाल गौर, फिर शिवराज सिंह... फिर आज का ये जश्न वाला दिन। यक़ीनन सीएम के तौर पर शिवराज सिंह के पांच साल पूरे करना स्थाईत्व की निशानी है, लेकिन ये बात भला मुझे क्यों ख़ुश करने लगी? सत्ता में दस साल रहकर ये स्थाईत्व तो दिग्विजय सिंह ने भी दिया था। वो तो उनका मैनेजमेंट गड़बड़ा गया, वरना स्थाईत्व तो चल ही रहा होता।
        दरअसल, ये तमाम बातें मैं इसलिए कह रहा हूं, क्योंकि मध्य प्रदेश के नागरिक के तौर पर मेरा भी जश्न मनाने को दिल करता है। मैं भी चाहता हूं कि यहां की तरक्की और तरक्की के लिए उठे सरकार के क़दम मेरे दिल को भी सुकून दें। अब सिर्फ़ इस बात के लिए कि शिवराज सिंह सत्ता के पांच बरस पूरे कर रहे हैं, मैं क्यों ख़ुश हो जाऊं? ना मैं किसी पार्टी का कार्यकर्ता हूं, ना ही मेरे गांव में चौबीस घंटे बिजली रहती है, ना ही सड़कों का ऐसा कायाकल्प हो गया कि तबीयत बाग-बाग हो उठे। कहीं ये मिशन 2013 की तैयारी तो नहीं? सौ फ़ीसदी ये वही है। विकास, हिंदुस्तान की राजनीति का नया मुद्दा है, जिसकी धार देखी भी जा रही है। मोदी, नीतीश, शीला दीक्षित, नवीन पटनायक अपने-अपने राज्यों में कुछ ऐसी ही ख़ुशनुमा तस्वीर पेश कर रहे हैं। बेहद लोकलुभावन चेहरे के साथ पार्टी यहां जनता के बीच जा रही है। शिवराज सिंह को अगले चुनाव में ऐसे ही पेश किया जाएगा, ये बात तय है।
         शिवराज सिंह के पास अपने सपनों को पूरा करने के लिए इस पारी में तीन साल का लंबा वक़्त बाक़ी है। पिछड़े और बीमारू मध्य प्रदेश को स्वर्णिम मध्य प्रदेश में तब्दील करने के लिए उनके पास अच्छा नज़रिया है। देखते हैं, क्या होता है। जिस रोज़ कामों में और तेज़ी आएगी, सरकार और संजीदगी से तरक्की की दिशा में सोचेगी, काम करेगी... उस दिन ना केवल कार्यकर्ताओं का बल्कि मतदाताओं का भी सम्मान होगा।

Thursday, November 11, 2010

बातें बालाघाट की: पहली किस्त

मध्य प्रदेश में दिग्विजय सिंह सरकार की दूसरी पारी में तीन मंत्री इस ज़िले का प्रतिनिधित्व कर रहे थे, ठीक उसी वक़्त केंद्र की अटल बिहारी वायपेयी सरकार में इस संसदीय क्षेत्र के सांसद मंत्री थे। यानी कुल चार मंत्री... एक ऐसे ज़िले से चुनकर भोपाल और दिल्ली में राजसत्ता का सुख भोग रहे थे, जब उनके निर्वाचन क्षेत्र दिनों-दिन बीमारू की श्रेणी में शामिल होते जा रहे थे। मैं समय की उस ख़ामोश हो चुकी लहर का ख़ास तौर पर इसलिए ज़िक्र कर रहा हूं क्योंकि यही वो दौर था, जब मैंने लोकतंत्र के जलसे में पहली आहूति दी थी। जी हां, पहली दफ़ा वोट डाला था। यही वो दौर था, जब मेरे अंदर राजनीतिक सोच और विचारधारा पनपने लगी थी। नागरिक होने का एहसास होने लगा था। इसके बाद न ही राज्य सरकार के ये तीनों मंत्री ही जीत सके और न ही केंद्र की सत्ता का सुख पा चुके सांसद महोदय।

मैं बात कर रहा हूं, बालाघाट की। मध्य प्रदेश का एक ज़िला है बालाघाट। मैंने यहीं जन्म लिया है। महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश की सीमा पर बसा एक शांत और ख़ूबसूरत शहर। प्रकृति यहां किस कदर अपनी ममता लुटाती है, ये शब्दों में कह पाना तो मुश्किल है। लेकिन कभी अगर आप यहां आएं तो पाएंगे कि सतपुड़ा की सरपरस्ती बालाघाट की ख़ूबसूरती में चार चांद लगा देती है। कुदरत का अकूत ख़ज़ाना यहां की ज़मीन में दबा हुआ है। एशिया की सबसे बड़ी कॉपर की खुली खदान इसी ज़िले के मलाजखंड में है। भरवेली अपने स्तरीय मैगनीज़ के लिए दुनिया भर में मशहूर है। इसके अलावा पूरे ज़िले में कहां-कहां मिट्टी अपने अंदर क्या-क्या समेटे हुए है, कहना मुश्किल है। संसाधनों की बात करें तो यहां का बांस भी विश्वस्तरीय है, जिसकी दुनिया भर में ख़ासी मांग है। यहां का सागौन काफ़ी उन्नत श्रेणी का है। यहां का उत्कृष्ट कोटि का चावल भी अपनी अलग ही पहचान रखता है। खेती के लिए यहां की ज़मीन उपजाऊ है, पानी की कोई कमी नहीं है। वन संपदा के लिहाज़ से भी बालाघाट काफ़ी समृद्ध है। कुल मिलाकर पहली नज़र में इस ज़िले की एक ख़ुशनुमा तस्वीर उभरकर सामने आती है, जो किसी भी क्षेत्र की तरक्की के लिए पहली ज़रूरी शर्त है।

इतना सब होने के बाद भी, आज़ादी के इतने बरसों के बाद तरक्की की दौड़ में बालाघाट कहीं नहीं है। सरकार रेवेन्यू का बड़ा हिस्सा यहां से हासिल करती है, लेकिन यहां के विकास के नाम पर अगर ईमानदारी से सोचा जाता तो आज शायद तस्वीर कुछ और ही होती। लेख की शुरुआत में ही मैंने बालाघाट के नेतृत्व का ज़िक्र किया है, वो इसलिए क्योंकि राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव हमेशा ही यहां विकास में रोड़ा बनता रहा है। आज़ादी के बाद जाने कितने सांसद हुए, कितने ही विधायकों को राज्य मंत्रिमंडल में प्रतिनिधित्व करने का मौक़ा मिला, लेकिन विकास को लेकर शायद ही कोई सियासतदां संजीदा हुआ हो। बात चाहे भोलाराम पारधी की हो, चिंतामनराव गौतम की, पीसीसी के अध्यक्ष रह चुके नंदकिशोर शर्मा की हो या विधानसभा के अध्यक्ष रह चुके तेजलाल टेंभरे की हो, कोई भी अपने क़द के मुताबिक़ बालाघाट के साथ न्याय नहीं कर सका। इसके अलावा शंकरलाल तिवारी, थानसिंह बिसेन, एनपी श्रीवास्तव, मधुसूदन गौतम, राणा हनुमान सिंह, सुरेंद्र खरे, विपिन पटेल, रमणीक लाल त्रिवेदी, लोचनलाल ठाकरे, यशवंतराव खोंगल, ओझा भाऊ रहांगडाले,  नीलकंठ बनोटे, कचरूलाल जैन, मोतीराम ओड़गू, लोचनलाल ठाकरे, भुवनलाल पारधी,  मुरलीधर असाटी, कन्हैया लाल खरे, चित्तौड़ सिंह, महिपाल सिंह उईके, प्रताप लाल बिसेन, झनकार सिंह नगपुरे, दिलीप भटेरे, लिखीराम कावरे आदि ने भी लंबे समय तक जिले की बागडोर अपने हाथ में रखी (सभी नेता दिवंगत हैं)। सभी अपने आप में बड़े नाम थे, शिखर पर बैठे राजनीतिज्ञों से इनकी ख़ूब बनती थी। जिले के विकास के लिए ये दोस्ती कभी काम आई हो, ऐसा देखने को नहीं मिला। मौजूदा राजनीतिज्ञों की बात करें, तो बालाघाट विधानसभा से विधायक और राज्य सरकार में काबीना मंत्री गौरीशंकर बिसेन लंबी पारी खेल चुके हैं और सर्वमान्य नेता हैं। कटंगी से विधायक विश्वेश्वर भगत दो बार सांसद रह चुके हैं, अर्जुन सिंह सरकार में मंत्री रह चुके हैं। बालाघाट के मौजूदा सांसद केडी देशमुख पहली बार दिल्ली गए हैं, लेकिन पांच मर्तबे विधानसभा में जनता की नुमाइंदगी कर चुके हैं। लगातार हार का सामना कर रहे तेज़ तर्रार नेता कंकर मुंजारे के तेवर मध्य प्रदेश विधानसभा में कई बार देखे गए हैं। उनकी पत्नी अनुभा मुंजारे भी लगातार दो बार बालाघाट नगर पालिका का नेतृत्व कर चुकीं हैं। वारासिवनी विधायक प्रदीप जायसवाल तीसरी बार विधायक बने हैं। जनता के बीच ख़ासे लोकप्रिय हैं, लिहाज़ा वारासिवनी नगर पालिका में अपनी पत्नी को अध्यक्ष बनवाने में क़ामयाब रहे। बैहर से विधायक भगत नेताम भी अपने पिता सुधनवा सिंह नेताम की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं। बैहर से ही विधायक रह चुके पूर्व मंत्री गणपतसिंह उईके का जादू अब ख़त्म सा हो गया है। इधर लांजी विधानसभा में पूर्व मंत्री दिलीप भेटेरे के युवा पुत्र रमेश भटेरे विधायक हैं। परसवाड़ा से भी युवा विधायक रामकिशोर कावरे युवा हैं, पहली बार विधानसभा पहुंचे हैं। कटंगी से ही दो बार विधायक रहे पूर्व मंत्री तामलाल सहारे इन दिनों मौक़े की तलाश में हैं। परिसीमन से पहले वजूद में रही खैरलांजी सीट से मंत्री रहे बाबा पटेल कहां ग़ायब हैं, पता नहीं।

कुल मिलाकर नेताओं की लंबी फेहरिस्त है। सभी बड़े नाम हैं। फिर ज़िले का नाम बड़ा क्यों नहीं है, अहम सवाल है। आज़ादी के बाद लंबे समय तक कांग्रेस सत्ता में रही है, और बालाघाट को कांग्रेस का गढ़ माना जाता रहा है। विधानसभा की 6 सीटों (परिसीमन से पहले 8) पर कांग्रेस का वर्चस्व हुआ करता था। बालाघाट को कमलनाथ के प्रभाव वाला ज़िला माना जाता है। ये कितना सच है, कहा नहीं जा सकता। लेकिन हां, कांग्रेस का पत्ता भी कमलनाथ के इशारे के बग़ैर नहीं हिलता, ये बात सौ फ़ीसदी सही है। नाथ साहब जब भी बालाघाट आते हैं, इसे गोद लेने की बात कह देते हैं। जनता ख़ुश हो जाती है, ख़ूब तालियां पीटती हैं। वैसे मैंने एक बात जो बहुत शिद्दत से महसूस की है, वो ये है कि कमलनाथ बालाघाट में कांग्रेस की कमान ऐसे हाथों में रखना चाहते हैं, जो उनके दरबार में सिर्फ़ सिर झुकाकर खड़े रहना जानते हों। टिकटों के बंटवारे में ये बात साफ़ दिखती है, जिताऊ उम्मीदवार कांग्रेस की टिकट शायद ही हासिल कर पा रहे हों। चाटुकारिता की इस गंदी राजनीति में बालाघाट को बहुत नुक़सान हुआ है। न ही अच्छे नेता मिल सके, न ही विकास हो सका।

बात भाजपा की करें, तो कोई शक़ नहीं... ज़िले की राजनीति में इस समय भाजपा ड्राइविंग सीट पर है। पार्टी के दिग्गज नेता गौरीशंकर बिसेन ख़ुद सरकार में मंत्री है। अनुभवी नेता केडी देशमुख पार्टी से सासंद हैं। ज़िले के अंधिकांश भाजपा विधायक युवा हैं। शिवराज सरकार की दूसरी पारी है, जिसके मुक़ाबले ज़िले में काम हो रहे हों, ऐसा दिखता तो नहीं। सभी नेता बहुत जल्दबाज़ी में दिख रहे हैं, अब उन्हें ही जल्दी है तो जनता भला क्यों देर लगाएगी। मिलते हैं 2013 में।

इस वक़्त ज़िले की राजनीति में जितने भी अनुभवी नेता हैं, वो अपनी विदाई का इंतज़ार कर रहे हैं। लेकिन नया नेतृत्व असरदार तरीके से आ नहीं रहा है, सो वो भी डटे हुए हैं। एक समय था, जब सत्तर के दशक में रामस्वरूप शुक्ला की अगुवाई में युवा तरुणाई की ऐसी आंधी चली कि भोपाल तक इसकी गूंज सुनाई दी थी। शुक्ला ने कांग्रेस से युवाओं को विधायक की टिकटें भी दिलवाई, लेकिन राजनीतिक तौर पर वे विफल रहे। मैं बालाघाट में हुए एक कार्यक्रम में गया था, जहां शुक्ला जी भी मौजूद थे। जब उनसे मार्गदर्शन के तौर पर दो शब्द कहने को कहा गया तो उन्होंने साफ़ कहा था कि जिसे ख़ुद ही मार्ग के दर्शन नहीं हुए, वो दूसरो को क्या मार्गदर्शन देगा? उनकी पीड़ा सहज ही समझी जा सकती थी। उसी दौर के युवा तुर्क अशोक मिश्रा, इंदर चंद जैन सरीखे नाम भी नेपथ्य में गुम हो गए।

सही नेतृत्व न होने का एहसास हमें इसलिए कचोटता है, क्योंकि दुनिया तेज़ी से आगे बढ़ रही है और मुट्ठी भर राजनीतिज्ञों ने आज तक हमारे ज़िले से छल ही किया है। यक़ीन मानिए वक़्त करवट ले रहा है, नया ख़ून सुनियोजित तरीक़े से दस्तक दे रहा है। वो दिमाग़ रखता है, तकनीक से लैस है, मूल्यों को समझता है, विरासत को आगे बढ़ाना जानता है, तरक्की पसंद है। अपने बालाघाट को और सहते वो नहीं देख पाएगा। कहीं ऐसा न हो अगला चुनाव जमे हुए राजनीतिज्ञों की ज़मीन ही छीन ले।

“झुक के मिलते हैं तो कमज़ोर ना समझना, शाख फलदार हो तो लचक आ ही जाती है।”

(लेखक युवा पत्रकार हैं, फिलहाल दैनिक भास्कर, भोपाल में हैं )


Tuesday, November 09, 2010

अबके जो मिले, तो क्या ख़ूब मिले...

कैसी रही आपकी दीपावली?  भई मैं तो आज ही छुटि्टयां मनाकर घर से लौटा हूं। बेहद शानदार रहा बीता हफ़्ता। न कामकाज की फ़िक्र रही, न ही ऑफिस की चिंता सताई। उत्सव के रंग ऐसे बिखरे कि साहब क्या कहने। एकबारगी तो ज़िंदगी पटरी पर लौटती दिखाई दी, लेकिन रात भर के सफ़र के बाद आज अलसुबह ही ये ख़ुशफ़हमी दूर हो ली। आज फिर दफ़्तर जाना है।
                           ख़ैर, ब्लॉग पर लंबे समय के बाद मौजूदगी दर्ज करा रहा हूं। जहां तक याद पड़ता है, पिछले लिखे और इस लिखे के दरमियां तक़रीबन 4 महीनों का फ़ासला है। लिखना छूट सा गया है। आज न जाने क्या सूझी, सफ़र की थकान को नज़रअंदाज़ करते हुए मैं लिख रहा हू। यक़ीन नहीं हो रहा है।

               पता है, इस बार की छुट्टियों में सबसे ख़ास बात क्या रही... मैं स्कूल, कॉलेज, मोहल्लों और शहर के उन तमाम दोस्तों से मिला, जो लंबे समय से पाए ही नहीं जा रहे थे। अभी कुछ ही बरस तो गुज़रे हैं, हम इकट्ठे साइकल पर सवार होकर शहर भर घूमा करते थे। ताज़ा ख़बर ये है कि यारों के दिन फिर गए हैं। ज़्यादातर दोस्त प्रशासनिक सेवाओं में चले गए हैं। कुछेक डॉक्टर हो गए हैं, कुछ वक़ीलों की तो  बहुतेरे इंजीनियरों की जमात में शामिल हो गए हैं। कुछ स्थानीय राजनीति में पैठ जमाने की जद्दोजहद कर रहे हैं, तो कुछ ने साबित कर दिया है कि वे अपने पुश्तैनी कारोबार को बेहतर तरीके से आगे बढ़ा सकते हैं। पत्रकार मैं अकेला हूं। सबसे मिलना दिल को सुकून दे गया। एक अजीब सी बेचैनी, एक दिल को दुखाने वाला खालीपन, जो हर वक़्त महसूस होता रहता है... वो इस दौरान जाता रहा।
                 बहुत लंबा वक्त नहीं बीता है, मुझे घर छोड़े या नौकरी थामे। शायद यही वजह है कि दोस्तों, परिवार वालों, रिश्तेदारों या किसी के भी छूटने पर दर्द बयां न करने का सलीका मुझमें अब तक नहीं आ सका है। हम तो कहते हैं साहब कि न ही आए तो बेहतर है। इस प्रवास के दौरान एक बात जो मैंने शिद्दत से महसूस की.. वो ये रही कि मैं घर लौट जाना चाहता हूं। इस हसरत को पूरा करने की क़ीमत क्या हो सकती है, इसका अंदाज़ा मुझे है।
                 तो बात यारों की हो रही थी। यार अब भी चाहते हैं कि मैं अपने शहर लौटकर राजनीति में किस्मत आज़माऊं। अब यारों का कहना है तो सही ही होगा। यार भी कभी ग़लत हुए हैं भला? वैसे भी कैलकुलेशन करके ज़िंदगी की राहों पर तो कम से कम नहीं चला जा सकता। अब तक का रास्ता वैसे भी बिना हिसाब-किताब के कटा है। मेरा मानना है कि अगर मेहनत की जाए तो मैं अपने मौजूदा पेशे यानी पत्रकारिता में काफ़ी क़ामयाब हो सकता हूं (बेहद निजी राय है)। पत्रकारिता से सियासत में जाना, आप सोचेंगे बड़ा महत्वाकांक्षी आदमी है। चलिए मान लिया मैंने कि मैं महत्वाकांक्षी हूं,  इसमें बुराई भी क्या है? वैसे ही सियासत मवालियों और नाक़ाबिलों के हाथों में है। हम जैसों के पास कम से कम महफ़ूज़ तो रहेगी। मैं ये नहीं समझ पाता कि क्यों मेरे पिता को इससे इत्तेफ़ाक रहता है कि मैं सियासत में हाथ आज़माऊं? क्यों मां को इस शब्द से ही नफ़रत है? आख़िर क्यों मेरे पड़ोसी सबसे मिलने के मेरे बेतकल्लुफ़ मिज़ाज को लेकर अपनी रातों का सुख-चैन लुटाते हैं? क्या इतना बुरा है राजनीति में जाने  का सोचना भी?

ये तो एक भाव था, आया सो लिख दिया। फिलहाल तो पैसों और नौकरी दोनों की दरकार है। फ़ैसला सोच-समझ कर लेना है।

इस दफ़ा जब घर पर था, एक जनाब मिले। उनकी पीड़ा ये थी कि बालाघाट (मेरा गृह ज़िला, मध्य प्रदेश की राजधानी से तक़रीबन 500 सौ किमी की दूरी पर बसा बेहद ख़ूबसूरत और उपेक्षित शहर)को सही तरीक़े से पेश नहीं किया जाता। भई इस दिशा में आप कुछ करते क्यों नहीं, राजधानी में पत्रकार हैं? मुझसे अनायास ही पूछा गया ये सवाल उस वक़्त तो मुझे निरुत्तरित कर गया... लेकिन पड़ताल में जुटा हूं। बालाघाट को लेकर कुछ ख़ास तथ्य और रोचक बातें लेकर जल्द आपके सामने आऊंगा। यक़ीन मानिए, सतपुड़ा की गोद में बसे इस बेहद ख़ूबसूरत शहर को जानबूझकर उपेक्षित रखा जा रहा है।
-------------------------


मेरे गांव में लक्ष्मी पूजा के तीसरे दिन गाएं खेलती हैं। आप सोचेंगे ये क्या, गाएं कैसे खेलती होंगी? दरअसल, इस ख़ास दिन पूरे गांव के मवेशी एक जगह इकट्ठे किए जाते हैं। यहां चरवाहा और उस समाज विशेष के लोग गौ माता की पूजा करते हैं। सारे मवेशियों की जमकर ख़ातिरदारी होती है।
कृषि आधारित अर्थव्यवस्था वाले देश के गांवों में होने वाले इस उत्सव की धूम का अंदाज़ा आपको हो रहा होगा। वैसे हम जैसे पढ़े-लिखे, समझदार लोगों ने इन उत्सवों से दूरी बना ली है।

एक और बात, मुझे भोपाल आए तीन महीने ही हुए हैं। इससे पहले वाला ठौर यानी छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर अब भी बहुत याद आता है। उस धूल-माटी वाले शहर से दिल लग सा गया था, वहां के साथियों को छोड़ने का सोग़ अब तक है। ख़ैर, ज़िंदगी है.. फिर मिलेंगे। लेख पढ़ने में आपको बेढंगा लग सकता है, क्या करूं... बेतरतीबी छिपाए नहीं छिपती।।

- निशान्त बिसेन