Saturday, December 25, 2010
आप स्वस्थ रहें
Tuesday, December 21, 2010
किसानों के दर्द से कराही राजधानी
Sunday, December 05, 2010
इस जनादेश के मायने...
Monday, November 29, 2010
मतदाता सम्मान हो तो बात बने
Monday, November 15, 2010
"द लेडी"
"अभिव्यक्ति की आज़ादी लोकतंत्र की नींव है, अगर आप बदलाव चाहते हैं तो आपको सही रास्ते पर चलना होगा"- आंग सांग सू ची
क़रीब दस बरस गुज़र गए, उन्होंने अपने दोनों बेटों को नहीं देखा है। वे दादी बन चुकी हैं, लेकिन अब तक अपने पोतों को गले से नहीं लगा सकी हैं। पिछले 21 में से 15 बरस उन्होंने अपने घर की चहारदीवारी में नज़रबंदी में काटे हैं। इस दौरान सारी दुनिया से वो कटी रहीं। न किसी से बात करने की इजाज़त, न फ़ोन का कनेक्शन और न ही दुनिया की ख़बर रखने के लिए इंटरनेट। साथ के नाम पर बस दो महिला सहयोगी और कभी-कभार मिलने वाले डॉक्टर और वक़ील।
ये कहानी है ‘द लेडी’ की। जी हां, उस मुल्क़ में द लेडी तो सिर्फ़ आंग सांग सू ची ही हैं। दो दशकों से भी ज़्यादा वक़्त हो गया, वो म्यांमार में लोकतंत्र की बहाली के लिए शांतिपूर्ण तरीके से अपनी आवाज़ रख रही हैं। उस सैन्य शासन के ख़िलाफ़, जो क़रीब 50 बरसों से म्यांमार में जमा हुआ है। अब भी बर्मा की अवाम की उम्मीद हैं, आंग सांग सू ची। 65 वर्षीय, बेहद शांत, मीठा बोलने वाली आंग सांग सू ची को 1991 में शांति के लिए नोबल पुरस्कार से भी नवाज़ा जा चुका है। म्यामांर के नेशनल हीरो रहे आंग सांग की ये बेटी पूरी जीवटता और जज़्बे के साथ सैन्य शासन के ख़िलाफ़ लोहा ले रही है। शनिवार को उनकी नज़रबंदी ख़त्म हो गई, जैसे ही वे अपने घर से बाहर निकलीं, उनके समर्थकों के बीच ख़ुशी की लहर दौड़ गई। सू ची की आंखों में अब भी वही चमक थी, अब भी अपने देश में लोकतंत्र की स्थापना का ख़्वाब उतना ही मुखर था। बकौल अमरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा, वे उनके नायकों में से एक हैं। दुनिया भर में सू ची की रिहाई का स्वागत हो रहा है।
सू ची ने तानाशाही के ख़िलाफ़ शांतिपूर्ण और अनूठे तरीके से लड़ाई लड़ी है। एक सादगी भरा पारिवारिक जीवन जीने वाली महिला का पहले नेता बनना और फिर दुनिया के सबसे मशहूर क़ैदी में तब्दील हो जाना इसी का हिस्सा रहा है। उनकी पार्टी नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी (NLD) ने 1990 के आमचुनावों में भारी बहुमत हासिल किया था, लेकिन वहां के शासक ने इन नतीजों को नहीं माना। सैन्य शासन जारी रहा, सू ची ने लंबा वक़्त नज़रबंदी में गुज़ारा। पढ़कर और पियानो बजाकर। 2003 में उनका बड़ा ऑपरेशन भी हुआ, जिसके बाद उन्हें घर में क़ैद कर दिया गया।
1990 के बाद बर्मा में 7 नवंबर को फिर चुनाव हुए। सू ची की पार्टी ने चुनाव की नियमावली पर सवाल उठाते हुए चुनाव में हिस्सा नहीं लिया। पार्टी के कुछ बड़े नेताओं ने नेशनल डेमोक्रेटिक फोर्स का गठन कर चुनाव में उतरने का फ़ैसला लिया। उनका मानना रहा कि बहिष्कार से लोकतंत्र की राह आसान नहीं रह जाएगी। लेकिन नतीजा वही रहा, सेना के समर्थन वाले नेशनल सॉलिडैरिटी एंड डेवलपमेंट एसोसिएशन ने जीत हासिल कर ली है। संयुक्त राष्ट्र संघ और पश्चिमी देशों ने चुनाव की पारदर्शिता पर सवाल उठाए हैं।
बात सिर्फ़ इतनी है कि हम ज़रा ज़रा से मसलों पर टूटने लगते हैं। इतना सब सहने के बाद भी वे अपने समर्थकों से कहती हैं कि 'उन्हें उम्मीद का दामन नहीं छोड़ना चाहिए, ना ही अपना दिल छोटा करना चाहिए'। वे कहती हैं, ‘सुनने और कहने का एक तय वक़्त होता है’। वे अब भी कहती हैं कि ‘हिम्मत हारने की कोई वजह नहीं है’। वे 'शांतिपूर्ण क्रांति' चाहती हैं, वे जानती हैं कि सरकार उन्हें किसी भी वक़्त फिर नज़रबंद कर सकती है और वे इसके लिए तैयार भी हैं। उन्हें भरोसा है कि म्यांमार में लोकतंत्र ज़रूर आएगा, भले ही इसमें वक़्त लगे। लोकतंत्र की बहाली लिए लड़ रही ‘द लेडी’ के जज़्बे को सलाम।।
आहों की तहरीर
(एक मित्र की डायरी का वो पन्ना हाथ लगा, जिस पर कुछ आहों की तहरीर दर्ज थी, हूबहू आपके सामने रख रहा हूं )
बेहद कमज़ोर नींव पर तैयार हुआ वो रिश्ता, अब भी अपना वजूद तलाशता है। ना इक़रार था, ना वादा था, ना निबाह की कोई कसम ही खाई हो कभी। बस वक़्त का कमज़ोर क़िस्सा था, हालात की तपिश में झुलस गया। दो लफ़्ज़ प्यार के क्या मिले, ज़ुल्फ़ों की पनाह में दो घड़ी सुकून क्या मिला, दिल हो लिया उनका। काश ! सोचा होता, किस राह को चला है? अगर सोच ही लेता, तो कमबख़्त किस बात का दिल होता? किस बात का अफ़सोस करता, किस दास्तां पर सोग़ मनाता?
मैं तो उसी वक़्त जानता था, ग़लत कर रहा है ये। ख़याल भी आया कि रोकूं इसे, बताऊं कि ग़लत है वो .. फिर सोचा, जाने दो। दिल है, करेगा तो अपने ही दिल की। अब भी अक्सर रोता है, रंज मनाता है। कहता है.. जिससे लग गया हूं, उसी के पास ले चलो। मैं जानता हूं, नादान है। समझाने की कोशिश भी नहीं करता। ग़लती की है, अब भुगते सज़ा। लेकिन कभी-कभी इसकी तक़लीफ़ मुझे भी दुखाती है। जाने कैसा होगा वो जिसने इस बेचारे को दुखाया, दर्द से मुब्तिला कराया, जिसने आठों पहर सिर्फ़ और सिर्फ़ उसी का ख़याल किया। जिसने कभी उसमें मंदिर के भगवान को देखा तो कभी मस्जिद के ख़ुदा को। उसकी दुआएं किसी मंत्र से कम नहीं थीं, उसकी पाक सदाएं किसी अजान से कम असर नहीं रखती थीं। मैं नहीं समझ पाया कभी, क़ुबूल क्यों नहीं हुई?
इन दिनों मेरा दिल सबसे ज़्यादा वक़्त मेरे ही साथ गुज़ारता है। मुझे पता ही नहीं चला, कब इसने दिमाग़ और रफ़्ता रफ़्ता पूरे शरीर को अपने साथ मिला लिया। अब सिर्फ़ दिल ही नहीं रोता, मैं भी सिसकता हूं। दिल को समझाने के लिए तो मैं था, लेकिन मुझे समझाने के लिए कोई नहीं है... कोई भी नहीं...
Thursday, November 11, 2010
बातें बालाघाट की: पहली किस्त
मैं बात कर रहा हूं, बालाघाट की। मध्य प्रदेश का एक ज़िला है बालाघाट। मैंने यहीं जन्म लिया है। महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश की सीमा पर बसा एक शांत और ख़ूबसूरत शहर। प्रकृति यहां किस कदर अपनी ममता लुटाती है, ये शब्दों में कह पाना तो मुश्किल है। लेकिन कभी अगर आप यहां आएं तो पाएंगे कि सतपुड़ा की सरपरस्ती बालाघाट की ख़ूबसूरती में चार चांद लगा देती है। कुदरत का अकूत ख़ज़ाना यहां की ज़मीन में दबा हुआ है। एशिया की सबसे बड़ी कॉपर की खुली खदान इसी ज़िले के मलाजखंड में है। भरवेली अपने स्तरीय मैगनीज़ के लिए दुनिया भर में मशहूर है। इसके अलावा पूरे ज़िले में कहां-कहां मिट्टी अपने अंदर क्या-क्या समेटे हुए है, कहना मुश्किल है। संसाधनों की बात करें तो यहां का बांस भी विश्वस्तरीय है, जिसकी दुनिया भर में ख़ासी मांग है। यहां का सागौन काफ़ी उन्नत श्रेणी का है। यहां का उत्कृष्ट कोटि का चावल भी अपनी अलग ही पहचान रखता है। खेती के लिए यहां की ज़मीन उपजाऊ है, पानी की कोई कमी नहीं है। वन संपदा के लिहाज़ से भी बालाघाट काफ़ी समृद्ध है। कुल मिलाकर पहली नज़र में इस ज़िले की एक ख़ुशनुमा तस्वीर उभरकर सामने आती है, जो किसी भी क्षेत्र की तरक्की के लिए पहली ज़रूरी शर्त है।
इतना सब होने के बाद भी, आज़ादी के इतने बरसों के बाद तरक्की की दौड़ में बालाघाट कहीं नहीं है। सरकार रेवेन्यू का बड़ा हिस्सा यहां से हासिल करती है, लेकिन यहां के विकास के नाम पर अगर ईमानदारी से सोचा जाता तो आज शायद तस्वीर कुछ और ही होती। लेख की शुरुआत में ही मैंने बालाघाट के नेतृत्व का ज़िक्र किया है, वो इसलिए क्योंकि राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव हमेशा ही यहां विकास में रोड़ा बनता रहा है। आज़ादी के बाद जाने कितने सांसद हुए, कितने ही विधायकों को राज्य मंत्रिमंडल में प्रतिनिधित्व करने का मौक़ा मिला, लेकिन विकास को लेकर शायद ही कोई सियासतदां संजीदा हुआ हो। बात चाहे भोलाराम पारधी की हो, चिंतामनराव गौतम की, पीसीसी के अध्यक्ष रह चुके नंदकिशोर शर्मा की हो या विधानसभा के अध्यक्ष रह चुके तेजलाल टेंभरे की हो, कोई भी अपने क़द के मुताबिक़ बालाघाट के साथ न्याय नहीं कर सका। इसके अलावा शंकरलाल तिवारी, थानसिंह बिसेन, एनपी श्रीवास्तव, मधुसूदन गौतम, राणा हनुमान सिंह, सुरेंद्र खरे, विपिन पटेल, रमणीक लाल त्रिवेदी, लोचनलाल ठाकरे, यशवंतराव खोंगल, ओझा भाऊ रहांगडाले, नीलकंठ बनोटे, कचरूलाल जैन, मोतीराम ओड़गू, लोचनलाल ठाकरे, भुवनलाल पारधी, मुरलीधर असाटी, कन्हैया लाल खरे, चित्तौड़ सिंह, महिपाल सिंह उईके, प्रताप लाल बिसेन, झनकार सिंह नगपुरे, दिलीप भटेरे, लिखीराम कावरे आदि ने भी लंबे समय तक जिले की बागडोर अपने हाथ में रखी (सभी नेता दिवंगत हैं)। सभी अपने आप में बड़े नाम थे, शिखर पर बैठे राजनीतिज्ञों से इनकी ख़ूब बनती थी। जिले के विकास के लिए ये दोस्ती कभी काम आई हो, ऐसा देखने को नहीं मिला। मौजूदा राजनीतिज्ञों की बात करें, तो बालाघाट विधानसभा से विधायक और राज्य सरकार में काबीना मंत्री गौरीशंकर बिसेन लंबी पारी खेल चुके हैं और सर्वमान्य नेता हैं। कटंगी से विधायक विश्वेश्वर भगत दो बार सांसद रह चुके हैं, अर्जुन सिंह सरकार में मंत्री रह चुके हैं। बालाघाट के मौजूदा सांसद केडी देशमुख पहली बार दिल्ली गए हैं, लेकिन पांच मर्तबे विधानसभा में जनता की नुमाइंदगी कर चुके हैं। लगातार हार का सामना कर रहे तेज़ तर्रार नेता कंकर मुंजारे के तेवर मध्य प्रदेश विधानसभा में कई बार देखे गए हैं। उनकी पत्नी अनुभा मुंजारे भी लगातार दो बार बालाघाट नगर पालिका का नेतृत्व कर चुकीं हैं। वारासिवनी विधायक प्रदीप जायसवाल तीसरी बार विधायक बने हैं। जनता के बीच ख़ासे लोकप्रिय हैं, लिहाज़ा वारासिवनी नगर पालिका में अपनी पत्नी को अध्यक्ष बनवाने में क़ामयाब रहे। बैहर से विधायक भगत नेताम भी अपने पिता सुधनवा सिंह नेताम की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं। बैहर से ही विधायक रह चुके पूर्व मंत्री गणपतसिंह उईके का जादू अब ख़त्म सा हो गया है। इधर लांजी विधानसभा में पूर्व मंत्री दिलीप भेटेरे के युवा पुत्र रमेश भटेरे विधायक हैं। परसवाड़ा से भी युवा विधायक रामकिशोर कावरे युवा हैं, पहली बार विधानसभा पहुंचे हैं। कटंगी से ही दो बार विधायक रहे पूर्व मंत्री तामलाल सहारे इन दिनों मौक़े की तलाश में हैं। परिसीमन से पहले वजूद में रही खैरलांजी सीट से मंत्री रहे बाबा पटेल कहां ग़ायब हैं, पता नहीं।
कुल मिलाकर नेताओं की लंबी फेहरिस्त है। सभी बड़े नाम हैं। फिर ज़िले का नाम बड़ा क्यों नहीं है, अहम सवाल है। आज़ादी के बाद लंबे समय तक कांग्रेस सत्ता में रही है, और बालाघाट को कांग्रेस का गढ़ माना जाता रहा है। विधानसभा की 6 सीटों (परिसीमन से पहले 8) पर कांग्रेस का वर्चस्व हुआ करता था। बालाघाट को कमलनाथ के प्रभाव वाला ज़िला माना जाता है। ये कितना सच है, कहा नहीं जा सकता। लेकिन हां, कांग्रेस का पत्ता भी कमलनाथ के इशारे के बग़ैर नहीं हिलता, ये बात सौ फ़ीसदी सही है। नाथ साहब जब भी बालाघाट आते हैं, इसे गोद लेने की बात कह देते हैं। जनता ख़ुश हो जाती है, ख़ूब तालियां पीटती हैं। वैसे मैंने एक बात जो बहुत शिद्दत से महसूस की है, वो ये है कि कमलनाथ बालाघाट में कांग्रेस की कमान ऐसे हाथों में रखना चाहते हैं, जो उनके दरबार में सिर्फ़ सिर झुकाकर खड़े रहना जानते हों। टिकटों के बंटवारे में ये बात साफ़ दिखती है, जिताऊ उम्मीदवार कांग्रेस की टिकट शायद ही हासिल कर पा रहे हों। चाटुकारिता की इस गंदी राजनीति में बालाघाट को बहुत नुक़सान हुआ है। न ही अच्छे नेता मिल सके, न ही विकास हो सका।
बात भाजपा की करें, तो कोई शक़ नहीं... ज़िले की राजनीति में इस समय भाजपा ड्राइविंग सीट पर है। पार्टी के दिग्गज नेता गौरीशंकर बिसेन ख़ुद सरकार में मंत्री है। अनुभवी नेता केडी देशमुख पार्टी से सासंद हैं। ज़िले के अंधिकांश भाजपा विधायक युवा हैं। शिवराज सरकार की दूसरी पारी है, जिसके मुक़ाबले ज़िले में काम हो रहे हों, ऐसा दिखता तो नहीं। सभी नेता बहुत जल्दबाज़ी में दिख रहे हैं, अब उन्हें ही जल्दी है तो जनता भला क्यों देर लगाएगी। मिलते हैं 2013 में।
इस वक़्त ज़िले की राजनीति में जितने भी अनुभवी नेता हैं, वो अपनी विदाई का इंतज़ार कर रहे हैं। लेकिन नया नेतृत्व असरदार तरीके से आ नहीं रहा है, सो वो भी डटे हुए हैं। एक समय था, जब सत्तर के दशक में रामस्वरूप शुक्ला की अगुवाई में युवा तरुणाई की ऐसी आंधी चली कि भोपाल तक इसकी गूंज सुनाई दी थी। शुक्ला ने कांग्रेस से युवाओं को विधायक की टिकटें भी दिलवाई, लेकिन राजनीतिक तौर पर वे विफल रहे। मैं बालाघाट में हुए एक कार्यक्रम में गया था, जहां शुक्ला जी भी मौजूद थे। जब उनसे मार्गदर्शन के तौर पर दो शब्द कहने को कहा गया तो उन्होंने साफ़ कहा था कि जिसे ख़ुद ही मार्ग के दर्शन नहीं हुए, वो दूसरो को क्या मार्गदर्शन देगा? उनकी पीड़ा सहज ही समझी जा सकती थी। उसी दौर के युवा तुर्क अशोक मिश्रा, इंदर चंद जैन सरीखे नाम भी नेपथ्य में गुम हो गए।
सही नेतृत्व न होने का एहसास हमें इसलिए कचोटता है, क्योंकि दुनिया तेज़ी से आगे बढ़ रही है और मुट्ठी भर राजनीतिज्ञों ने आज तक हमारे ज़िले से छल ही किया है। यक़ीन मानिए वक़्त करवट ले रहा है, नया ख़ून सुनियोजित तरीक़े से दस्तक दे रहा है। वो दिमाग़ रखता है, तकनीक से लैस है, मूल्यों को समझता है, विरासत को आगे बढ़ाना जानता है, तरक्की पसंद है। अपने बालाघाट को और सहते वो नहीं देख पाएगा। कहीं ऐसा न हो अगला चुनाव जमे हुए राजनीतिज्ञों की ज़मीन ही छीन ले।
“झुक के मिलते हैं तो कमज़ोर ना समझना, शाख फलदार हो तो लचक आ ही जाती है।”
(लेखक युवा पत्रकार हैं, फिलहाल दैनिक भास्कर, भोपाल में हैं )
Wednesday, November 10, 2010
एक चव्हाण गए, दूसरे आए
सवाल उठता है कि क्या कांग्रेस वाकई दाग़दार छवि के लोगों को बाहर का रास्ता दिखाना चाहती है, जैसा उसने चव्हाण और कलमाडी को बाहर कर किया या ये महज़ उस हंगामे को दबाने की क़वायद है, जो शीतकालीन सत्र में हो सकता है। यक़ीनन, कांग्रेस ने इस क़दम से नैतिक तौर पर बढ़त हासिल कर ली है और विपक्ष को मुद्दाविहीन कर दिया है। भ्रष्टाचार को लेकर विपक्ष का हथियार फिलहाल तो भोथरा ही दिखाई देता है। 2G स्पेक्ट्रम घोटाले को लेकर आरोपों से घिरे ए राजा को लेकर कांग्रेस की क्या रणनीति होती है, ये ग़ौर फ़रमाने वाली बात होगी। यहां तो मामला घर का था, लेकिन वहां गंठबंधन का लिहाज़ रखना होगा। कांग्रेस की अपनी मजबूरियां भी हैं, सो पता चल जाएगा कि क्या पार्टी वाकई दाग़ियों को बर्दाश्त करने के मूड में नहीं है?
बात महाराष्ट्र की करें, तो पृथ्वीराज चव्हाण बेहद मुश्किल वक़्त में राज्य की बागडोर संभाल रहे हैं। फिलहाल वे राज्यसभा से सांसद है। केंद्र की राजनीति के साथ उनका लंबा संसदीय कार्यानुभव भी है, लेकिन महाराष्ट्र की राजनीति में उनका दख़ल न के बराबर रहा है। तिस पर राज्य में सत्ता में सहयोगी एनसीपी के नेता शरद पवार से भी उनके बहुत अच्छे ताल्लुक़ात नहीं हैं। लिहाज़ा देखना होगा किस तरह वे गठबंधन की गाड़ी को हांकते हैं? वैसे उनका कहना है कि वे केंद्र में रहकर काफ़ी क़रीब से गठबंधन सरकार को देख चुके हैं और जानते हैं इस धर्म का पालन कैसे किया जाना है? लेकिन चुनौतियां तो फिर भी हैं, राज्य में किसानों की हालत बदतर है। गांवों में बिजली संकट है। कई पुराने और अनुभवी चेहरों को दरकिनार कर उन्हें सत्ता का ताज सौंपा जा रहा है। उम्मीद की जानी चाहिए कि वे ख़ुद और अपने आकाओं को सही साबित करने में कोई कसर बाक़ी नहीं रखेंगे।।
अब देर नहीं लगती
हर मील पे देखा है, पत्थर को बदलते
अपने सफ़र पे हमको, जमकर रहा ग़ुमान
सहमे हुए सुनते हैं, औरों के तजुर्बे
लो देख ली दुनिया, लो कुछ नहीं हासिल
रक़ाब पर लिहाज़ा, हम पांव नहीं रखते
मुमक़िन है तुमको ना हो, इस हश्र पर यकीं
होता तुम्हें भी पास, इस राह ग़र गुज़रते
- निशांत बिसेन
Tuesday, November 09, 2010
अबके जो मिले, तो क्या ख़ूब मिले...
ख़ैर, ब्लॉग पर लंबे समय के बाद मौजूदगी दर्ज करा रहा हूं। जहां तक याद पड़ता है, पिछले लिखे और इस लिखे के दरमियां तक़रीबन 4 महीनों का फ़ासला है। लिखना छूट सा गया है। आज न जाने क्या सूझी, सफ़र की थकान को नज़रअंदाज़ करते हुए मैं लिख रहा हू। यक़ीन नहीं हो रहा है।
पता है, इस बार की छुट्टियों में सबसे ख़ास बात क्या रही... मैं स्कूल, कॉलेज, मोहल्लों और शहर के उन तमाम दोस्तों से मिला, जो लंबे समय से पाए ही नहीं जा रहे थे। अभी कुछ ही बरस तो गुज़रे हैं, हम इकट्ठे साइकल पर सवार होकर शहर भर घूमा करते थे। ताज़ा ख़बर ये है कि यारों के दिन फिर गए हैं। ज़्यादातर दोस्त प्रशासनिक सेवाओं में चले गए हैं। कुछेक डॉक्टर हो गए हैं, कुछ वक़ीलों की तो बहुतेरे इंजीनियरों की जमात में शामिल हो गए हैं। कुछ स्थानीय राजनीति में पैठ जमाने की जद्दोजहद कर रहे हैं, तो कुछ ने साबित कर दिया है कि वे अपने पुश्तैनी कारोबार को बेहतर तरीके से आगे बढ़ा सकते हैं। पत्रकार मैं अकेला हूं। सबसे मिलना दिल को सुकून दे गया। एक अजीब सी बेचैनी, एक दिल को दुखाने वाला खालीपन, जो हर वक़्त महसूस होता रहता है... वो इस दौरान जाता रहा।
बहुत लंबा वक्त नहीं बीता है, मुझे घर छोड़े या नौकरी थामे। शायद यही वजह है कि दोस्तों, परिवार वालों, रिश्तेदारों या किसी के भी छूटने पर दर्द बयां न करने का सलीका मुझमें अब तक नहीं आ सका है। हम तो कहते हैं साहब कि न ही आए तो बेहतर है। इस प्रवास के दौरान एक बात जो मैंने शिद्दत से महसूस की.. वो ये रही कि मैं घर लौट जाना चाहता हूं। इस हसरत को पूरा करने की क़ीमत क्या हो सकती है, इसका अंदाज़ा मुझे है।
तो बात यारों की हो रही थी। यार अब भी चाहते हैं कि मैं अपने शहर लौटकर राजनीति में किस्मत आज़माऊं। अब यारों का कहना है तो सही ही होगा। यार भी कभी ग़लत हुए हैं भला? वैसे भी कैलकुलेशन करके ज़िंदगी की राहों पर तो कम से कम नहीं चला जा सकता। अब तक का रास्ता वैसे भी बिना हिसाब-किताब के कटा है। मेरा मानना है कि अगर मेहनत की जाए तो मैं अपने मौजूदा पेशे यानी पत्रकारिता में काफ़ी क़ामयाब हो सकता हूं (बेहद निजी राय है)। पत्रकारिता से सियासत में जाना, आप सोचेंगे बड़ा महत्वाकांक्षी आदमी है। चलिए मान लिया मैंने कि मैं महत्वाकांक्षी हूं, इसमें बुराई भी क्या है? वैसे ही सियासत मवालियों और नाक़ाबिलों के हाथों में है। हम जैसों के पास कम से कम महफ़ूज़ तो रहेगी। मैं ये नहीं समझ पाता कि क्यों मेरे पिता को इससे इत्तेफ़ाक रहता है कि मैं सियासत में हाथ आज़माऊं? क्यों मां को इस शब्द से ही नफ़रत है? आख़िर क्यों मेरे पड़ोसी सबसे मिलने के मेरे बेतकल्लुफ़ मिज़ाज को लेकर अपनी रातों का सुख-चैन लुटाते हैं? क्या इतना बुरा है राजनीति में जाने का सोचना भी?
ये तो एक भाव था, आया सो लिख दिया। फिलहाल तो पैसों और नौकरी दोनों की दरकार है। फ़ैसला सोच-समझ कर लेना है।
इस दफ़ा जब घर पर था, एक जनाब मिले। उनकी पीड़ा ये थी कि बालाघाट (मेरा गृह ज़िला, मध्य प्रदेश की राजधानी से तक़रीबन 500 सौ किमी की दूरी पर बसा बेहद ख़ूबसूरत और उपेक्षित शहर)को सही तरीक़े से पेश नहीं किया जाता। भई इस दिशा में आप कुछ करते क्यों नहीं, राजधानी में पत्रकार हैं? मुझसे अनायास ही पूछा गया ये सवाल उस वक़्त तो मुझे निरुत्तरित कर गया... लेकिन पड़ताल में जुटा हूं। बालाघाट को लेकर कुछ ख़ास तथ्य और रोचक बातें लेकर जल्द आपके सामने आऊंगा। यक़ीन मानिए, सतपुड़ा की गोद में बसे इस बेहद ख़ूबसूरत शहर को जानबूझकर उपेक्षित रखा जा रहा है।
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मेरे गांव में लक्ष्मी पूजा के तीसरे दिन गाएं खेलती हैं। आप सोचेंगे ये क्या, गाएं कैसे खेलती होंगी? दरअसल, इस ख़ास दिन पूरे गांव के मवेशी एक जगह इकट्ठे किए जाते हैं। यहां चरवाहा और उस समाज विशेष के लोग गौ माता की पूजा करते हैं। सारे मवेशियों की जमकर ख़ातिरदारी होती है।
कृषि आधारित अर्थव्यवस्था वाले देश के गांवों में होने वाले इस उत्सव की धूम का अंदाज़ा आपको हो रहा होगा। वैसे हम जैसे पढ़े-लिखे, समझदार लोगों ने इन उत्सवों से दूरी बना ली है।
एक और बात, मुझे भोपाल आए तीन महीने ही हुए हैं। इससे पहले वाला ठौर यानी छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर अब भी बहुत याद आता है। उस धूल-माटी वाले शहर से दिल लग सा गया था, वहां के साथियों को छोड़ने का सोग़ अब तक है। ख़ैर, ज़िंदगी है.. फिर मिलेंगे। लेख पढ़ने में आपको बेढंगा लग सकता है, क्या करूं... बेतरतीबी छिपाए नहीं छिपती।।
- निशान्त बिसेन
Thursday, July 22, 2010
सुकून भरी ख़बर
कहने का आशय है, मुद्दों को लेकर सियासी लड़ाई चरम पर है। खेद सिर्फ़ इतना है कि इस लड़ाई में हथियार, बौद्धिक विमर्श या बहस ना होकर जूते-चप्पल, गमले और कुर्सियां हैं। हमनें अब तक सिर्फ़ भ्रष्टाचार का ज़िक्र किया है, इसके अलावा भी दिगर मुद्दे हैं जो गूंज रहे हैं। आंतरिक सुरक्षा, बढ़ती महंगाई और जाने क्या क्या… दो राय नहीं संसद के मॉनसून सत्र के भी ज़बरदस्त हंगामाखेज़ रहने के आसार हैं। ख़ैर, ज़्यादा तनाव मत लीजिए, अगर आपको दूसरों की ख़ुशी से राहत मिलती है तो एक सुकून भरी ख़बर है।
भले ही आपकी थाली से वेरायटी ग़ायब हो रही है, भले ही आपके बटुए का वज़न रोज़ ब रोज़ हल्का हो रहा है, भले ही आपकी कंपनी आप पर मेहरबान ना हो रही हो... लेकिन, लेकिन सभी इतने बेबस और लाचार नहीं हैं। सभी ‘मैंगोपीपल’ नहीं हैं। जी हां, भले ही आप पाई-पाई की जुगत में लगे हों, भले ही आपका इंक्रीमेंट ना लग रहा हो लेकिन असम विधानसभा ने अपने विधायकों की तनख़्वाह में चार सौ फ़ीसदी का इंक्रीमेंट लगाया है, है ना सुकून भरी ख़बर।
Sunday, July 04, 2010
नींद में ख़लल तो नहीं ?
- निशांत बिसेन
ना ना करते भी शायद अब सरकारों का ये भरम टूटने लगा है कि उनका ख़ुफ़ियातंत्र, उनके सूत्र, उनकी रणनीति और उनके इरादे नक्सलियों पर नकेल लगाने के लिए काफ़ी हैं, ऐसा क्यों है ?? बताने या जताने की ज़रूरत शायद अब नहीं रह गई हो।
पिछले तीन महीनों में सवा सौ से ज़्यादा CRPF के जवान, नक्सली क़हर का शिकार हो चुके हैं। ये वो जवान हैं.. जो नक्सलियों का मुक़ाबला करने के लिए बाहरी राज्यों से आए थे। ये उन जगहों पर हुई वारदातों में शहीद हुए, जहां का हर ज़र्रा लाल आतंक की ज़द में है। हर क़दम पर बिछा बारूद, हर शै में छिपी क़ातिलाना ख़ामोशी और इन सब से बेख़बर ये जवान... मानो झोंक दिए गए हैं उस समर में, जहां हर क्षण युद्ध के क़ायदे बदले जा रहे हैं।
अव्वल तो सरकारें ये समझें कि क्यों इन ज़िंदादिल जवानों के सीने पर मौत की इबारत लिखी जा रही है ? क्यों उस रणभूमि में इन्हें अकेला छोड़ दिया गया है, जिसके भौगोलिक हालात से तक ये वाक़िफ़ नहीं ? उधर, नक्सली क़ामयाबी पर क़ामयाबी हासिल किए जा रहे हैं... और इधर, सिरफुटौव्वल जारी है। शहीदों के रिसते ख़ून को साक्षी मानकर हर बार नए सिरे से लड़ाई लड़ने की बात तो कही जाती है, लेकिन... ऐसा नज़र तो नहीं आता। फिलहाल तो यही तय नहीं है कि आर-पार की इस लड़ाई में हमारे लड़ाके कौन हैं ? राज्य पुलिस, केंद्रीय सुरक्षा बल, सेना या फिर कोई और ? सुरक्षा बलों में तालमेल की कमी भी मीडिया के मार्फ़त जगज़ाहिर हो चुकी है, हालिया वारदातों ने जता दिया है कि ख़ुफ़ियातंत्र बुरी तरह से विफल रहा है। यक़ीनन, आए दिन अपने साथियों का हश्र देख रहे जवानों के हौसले पर भी असर दिखने लगा है... वो मरने से नहीं डरते, लेकिन, सिर्फ़ इसलिए तो उन्हें मौत के मुंह में नहीं धकेला जा सकता। सियासी बयानबाज़ियों के लिए देश में मुद्दों की कमी नहीं... सियासतदां, सुरक्षा के मसले पर तो कम से कम संजीदा हों।
एक वो हैं जो लड़ते-गिरते भारत मां के लिए वीरगति पाते हैं, एक ये हैं जो हर बार पानी सिर से ऊपर हो जाने की दुहाई देते हैं... और फिर ख़तरे के निशान को थोड़ा ऊपर कर देते हैं।
Wednesday, February 24, 2010
ममता Vs सचिन
ख़ैर, बारी ममता की थी, अपनी बंगाल केंद्रित छवि से बाहर निकलना चुनौती थी। लेकिन मुमक़िन न रहा, अगर आपने बजट भाषण सुना हो तो महसूस किया होगा कि बाहरी राज्यों की घोषणाओं पर वो जमकर प्रदर्शन करती रहीं, लेकिन दबी ज़ुबान में अगला ऐलान बंगाल के नाम करने से नहीं चूकी। किसको क्या मिला, मायने नहीं रखता... क्योंकि ममता ने सबके लिए कुछ ना कुछ रखा ही था... अब भला Dependence of availability की भाषा कौन समझता है। बजट लोकलुभावन रहा, बंगाल और बिहार की तो मानो पौ बारह हो गई।
दिन भर ममता मेल, दीदी की ट्रेन, ममता की छुकछुक, ममता से आस, माई नेम इज़ ममता जैसे प्रोग्राम टीवी पर जमकर छाए रहे, चार बजते-बजते ममता की ख़ुमारी उतरी... और छा गए सचिन। जी हां, लोग भूल ही गए कि उन्हें क्या मिला और क्या नहीं मिला। सचिन के डबल धमाके के आगोश में हर कोई ऐसा डूबा कि बजट... गया भाड़ में। टीवी चैनलों ने तो ये तक चला दिया कि 'भूलो बजट को सचिन को देखो'। बेशक़, सचिन का प्रदर्शन बेहतरीन रहा....
लेकिन सोचिए, क्या हमारा रोमांच... हमारी ज़रूरतो, हमारे अधिकारों पर हावी हो रहा है... वो भी एक ऐसे राज्य में रहते हुए, जिसे कुछ भी नहीं मिला।।
Friday, February 19, 2010
Friday, February 05, 2010
क़ामयाब रहा मिशन मुंबई

लंबे समय से उत्तर भारतीयों को लेकर मातोश्री में लिखी जा रही पटकथा के पन्नों को आज एक ऐसी आंधी उड़ा ले गई, जिसे हवा का कमज़ोर झोंका समझा जा रहा था। कांग्रेस का ये बांका सजीला नौजवान नेता लंबे समय से देश को समझने में लगा है और लगातार की जा रही अपनी ईमानदार कोशिशों से अब देश भी उसे समझने लगा है। सियासत के मौजूदा ट्रेंड से हटकर 'नेता' शब्द की खोई परिभाषा को हासिल करने के लिए राहुल गांधी जुटे हुए हैं। पटना का वीमेन्स कॉलेज हो, जबलपुर का सेंट अलॉयसियस या फिर मुंबई का भाईदास हॉल... हर मौक़े पर राहुल टीनएजर्स और युवाओं में ख़्वाब जगाते दिखे।
उत्तर भारतीयों को लेकर यूं तो शिवसेना लंबे समय से ज़हर उगल रही थी, सवाल सिर्फ़ उत्तर भारतीयों का नहीं। बल्कि उस मुंबई का है, जिसकी रगों में आहिस्ता-आहिस्ता नफ़रत की सीरींज सुभोई जा रही है... जिस किसी ने भी मुंबई को पूरे देश का बताने की कोशिश की, सेना ने उसी की ओर निगाह तरेरी। हालिया बयान दिया, राहुल ने... उन्होंने कहा कि भारत, पूरे भारतीयों का है। भला इस बयान पर किसी को क्या एतराज़ होगा, लेकिन शिवसेना को ये रास नहीं आया, उन्होंने राहुल को जमकर कोसा। फिर क्या था, बेहद शांत, संयत दिखने वाले राहुल ने मुंबई जाने का प्लान बनाया, आनन-फ़ानन में तैयार हुए शेड्यूल के बीच मुंबई जाने के ठीक एक दिन पहले राहुल ने मराठी नौजवान राजीव सातव के हाथों में राष्ट्रीय युवा कांग्रेस की कमान सौंपी। सेना का बूढ़ा शेर ड्रॉइंग रूम में बैठे-बैठे चिल्लाता रहा कि राहुल गांधी का मुंबई पहुंचने पर पुरअसर तरीके से विरोध होगा, राहुल कुछ नहीं बोले।
शुक्रवार, आज मुंबई का सूरज नई चमक के साथ कांग्रेस के इस सितारे का इंतज़ार कर रहा था। सुरक्षा के चाक-चौबंद इंतज़ामों के बीच राहुल मुंबई पहुंचते हैं, 4 घंटे देश की आर्थिक राजधानी में बिताते हैं... बिना मीडिया से मुख़ातिब हुए... बिना कोई बयान दिए, वो मुंबईकर का दिल जीत कर चले जाते हैं। महज़ 4 घंटों में वो मुंबईवालों का दिल जीत लेते हैं, और शिवसेना के पास सिवाय हाथ मलने के कुछ नहीं रह जाता। समझ नहीं आता शिवसेना को बयान देने और अपने घर के अख़बार में लिखने की ऐसी क्या जल्दी होती है ? कहीं ऐसा तो नहीं कि
सेना को एहसास हो गया है कि उसका जनाधार तेज़ी से कम हो रहा है, और राहुल के आने पर उठे काले झंडे उसकी बौखलाहट है ? राहुल के मुंबई आने से पहले बाला साहेब कहते और लिखते रहे, अब उनके जाने के बाद उद्धव कह रहे हैं कि राहुल ने मुंबई में जो कुछ भी किया, वो दिखावा है। लेकिन, अब इससे क्या ? मुल्क़ लगातार देख रहा है कि कौन क्या कर रहा है। दिखावा और ढोंग एक बार हो सकता है, दो बार या तीन बार हो सकता है, लेकिन लगातार की जाने वाली उनकी कोशिशें ईमानदार हैं... ये राहुल जता चुके हैं। बीते कुछ बरसों में अपने गिरते स्तर से सियासत जितनी शर्मसार हुई है, राहुल जैसे नेता उसका खोया गौरव फिर दिलाना चाहते हैं। इस लेख का मक़सद राहुल गांधी का महिमामंडन नहीं है लेकिन उनका बढ़ता क़द और मौक़परस्तों को कमज़ोर होते देखना सुकून भी देता है।
Wednesday, February 03, 2010
कौन सुनेगा हमें ?

सोचता हूं सियासत में हाथ आज़मा लूं, वैसे ग़लत नहीं सोचता... ग़लत इसलिए नहीं, क्योंकि सुना है इन दिनों राजनाति में भी टैलेंट हंट चल रहा है, राहुल तो युवाओं की नेतृत्व क्षमता को परख ही रहे हैं, उम्मीद है उधर गडकरी को भी देर सबेर युवा शक्ति का इल्म हो ही जाएगा.. और हम तो ठहरे पुराने क़ाबिल। भले ही उम्र 26 की हो, लेकिन जज़्बा कुछ कर गुज़रने का है... तो तय रहा कि अगला विधानसभा चुनाव लड़ेंगे हम। हम तो लड़ लेंगे लेकिन मुश्किल ये है कि कौन हम पर दांव लगाएगा, कांग्रेस, भाजपा या कोई और..?
हम मिडिल क्लास लोगों के साथ यहीं मुश्किल है, जहां जाते हैं एक नई शुरुआत, एक नई पहचान हासिल करने की चुनौती... ना ख़ुद को पेश करना करना आता है, और ना होता है कोई गॉडफॉदर... ना किसी नामचीन राजनीतिक ख़ानदान के वारिस होने का तमगा। डगर मुश्किल है, चुनौतियां कई हैं, राह कांटों भरी है... फिर भी हम तो ठहरे हम... इराद कर लिया है तो कर ही लिया है।
तो कहां थे हम...? कौन बनेगा हमारा गॉडफॉदर…? भई ये नया दौर है, और इस नए दौर में हम लोग आगे नहीं आएंगे तो कौन भला आएगा, गांव के गर्दों-गुबार से गुज़रकर कॉर्पोरेट हाउस का चेहरा बन चुके हम ही तो हक़ीक़त में वर्तमान हैं। हमें ही तो जूझना है... अपने हिस्से का संघर्ष तो कर ही लें।
वैसे भी,
हम ख़ुद तलाशते हैं मंज़िल की राहों को,
हम वो नहीं हैं जिनकों ज़माना बना गया।।
इस लेख में मैंने कई दफ़ा हम शब्द का इस्तेमाल किया है, इस हम में कई मैं शामिल हैं... कोई सुनेगा हमें।।
Wednesday, September 23, 2009
कोई इधर भी देखे

छत्तीसगढ़ की राजधानी से तक़रीबन 230 किलोमीटर की दूरी पर बसा एक शहर, कोरबा... आप इसे ऐसे भी जान सकते हैं कि यहां बालको का पॉवर प्लांट है। देश-दुनिया की तमाम हलचलों से बेख़बर ये शहर रोज़ की तरह अपनी ज़िंदगी जी रहा था। न्यूज़ चैनलों की सुर्खियों में बने रहने के लिए ना ही यहां कोई बच्चा गड्ढे में गिरा था और ना ही इस शहर के किसी बाशिंदे ने अपनी दिक्कतों से आजिज़ होकर इच्छा मृत्यु की गुहार लगाई थी, ना ही सुर्खियां बटोरने के लिए कोई आदम ख़ुदा बना हुआ था।
गरबे की धूम और राहुल महाजन के स्वयंवर से पटे मसाला बुलेटिनों के बीच शायद आप तक कोरबा में हुए हादसे की ख़बर आप तक पहुंची हो... शायद न भी पहुंची हो। दरअसल, कोरबा के बालको पॉवर प्लांट में एक बन रही चिमनी के गिर जाने से इसके मलबे में सैकड़ों लोग फंसे गए, 22 की तो मौत की पुष्टि भी हो चुकी... जबकि 25 इंजीनियरों समेत दर्जनों मज़दूर अब भी मौत के दामन से वापस आने के लिए जूझ रहे हैं। अगर वो ज़िंदा रहे तो ख़ुशकिस्मत वरना मौत के बाद वो एक लाख रुपए तो उनके घरवालों को मिल ही जाएंगे, जिसका ऐलान राज्य सरकार ने कर दिया है। दरअसल, हुआ कुछ यूं कि यहां 250 मीटर ऊंची चिमनी का निर्माण चल रहा था, चिमनी का काम 100 मीटर तक पूरा भी हो चुका था... अचानक क्या हुआ जो इतनी बड़ी चिमनी भरभराकर गिर पड़ी, और एक साथ कई घरों के चिराग बुझ गए ?
इतना बड़ा निर्माण, इतना बड़ा नाम... और इतनी ग़ैर संजीदगी ? ऐसा भी नहीं कि इस तरह का हादसा कोई पहली दफ़ा हुआ हो, किसी ने पिछले हादसों से सबक लेने ज़रूरत नहीं समझी, निर्माण में इस्तेमाल किए जा रहे सामानों का गुणवत्ता पर ख़रे न होना भी इस हादसे की बड़ी वजह रहा, वरना हम ‘हादसों की चिमनी’, ‘चिमनी में मौत’, ‘100 मीटर ऊंची मौत’ जैसी उपमाओं का इस्तेमाल न कर रहे होते।
सरकार ने भले ही न्यायिक जांच के आदेश दे दिए हैं, मुआवज़े का ऐलान भी कर दिया है... बेहतर होगा सरकार और प्रशासन इन हादसों की पुनरावृत्ति को रोकने की दिशा में क़दम उठाए।
बात हादसे की जगह पर मौजूद भीड़ की, बात उस भीड़ के ग़ुस्से की, बात आक्रोश की... ये ग़ुस्सा ऐसा भड़का कि एक की जान लेकर ही माना। अपने साथियों को दम तोड़ते देखकर कुछ मज़दूरों के निर्माण कंपनी के एक कर्मचारी को मारने को अब सही कहा जाए या ग़लत, ये फ़ैसला आप करें।
इस वक़्त ज़रूरत है, मरने वालों के परिवार वालों के साथ खड़े रहने की। ज़रूरत है मलबे में फंसे लोगों को फिर ज़िंदगी देने की... ताकि मौत का ये ग्राफ 22 से ऊपर ना बढ़ सके।
Tuesday, September 22, 2009
शुभकामनाएं

ज़्यादा वक़्त नहीं गुज़रा ब्लॉगिंग शुरू किए, सोचा था यहां रेगुलर रहूंगा... लेकिन तब से अब तक का ये फ़ासला तक़रीबन दो महीने का है। चलिए इन फ़ासलों को पाटा जाएं, दूरियों को नापा जाए।
सबसे पहले तो आपको त्योहारों की बहुत-बहुत शुभकामनाएं। इन दिनों गरबे पर थिरकते क़दमों के साथ पूरा देश झूम रहा है, मंदिरों में आस्था की छटा देखते ही बनती है, दशहरे की तैयारियां ज़ोरों पर है... और सेवइयों की ख़ुशबू अब तक माहौल ख़ुशनुमा किए हुए है। मैं इस वक़्त जहां हूं यानि छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर, यहां भी आस्था की बड़ी गौरवशाली परंपरा है, इस राज्य में ऐसी जगहों की कमी नहीं जहां पहुंच जाने पर आपको ना केवल आत्मिक शांति मिलती है बल्कि आप पहले से ज़्यादा आत्मविश्वास से भरे होते हैं। नवरात्र में इन दिनों अगर आप सड़कों पर देखें तो आपको लगातार ऐसे जत्थे नज़र आएंगे जो मातारानी के दरस को निकले होते हैं, नंगे पांव... पता नहीं कहां से आ रहे हैं, कहां जा रहे हैं... पूरे जोश के साथ। दुनिया तो घूमी नहीं, लेकिन सौ फ़ीसदी यक़ीन है... ये हिंदुस्तान में ही होता होगा। आस्था और श्रद्धा की अलख जगाते, माता के जयकारे लगाते, ये बताते-जताते कि वो माता के सबसे अच्छे बच्चे हैं... वो चले जा रहे हैं। उम्मीद है क़दम दर क़दम बढ़ती ये आस्था, देश और समाज को और मज़बूत करेगी।
हम हिंदुस्तानियों में एक ख़ासियत तो है, हम उत्सवों में ज़िंदगी तलाशते हैं। भले ही हम तमाम मुश्किलात से घिरे हों लेकिन मज़ाल है जो जश्न का एक मौक़ा भी हम गंवा दें। हो सकता है कई लोगों ने बड़ी दिक्कत में पिछला वक़्त गुज़ारा हो, कुछ ने नौकरियां गंवाई तो कुछ ने कारोबार में घाटा सहा... कुछ अच्छे वक़्त का इंतज़ार करते रहे तो हम जैसे कुछ पे-स्लिप के वज़नदार होने का। बीता वक़्त देश के लिए बहुत बेहतर नहीं रहा, बारिश... इसकी बेरुख़ी ने तो जैसे इकोनॉमी की चूले हिला दी, बादलों का रुठना ही तो रहा जो सरकार भी आने वाले वक़्त को लेकर फ़िक्रमंद दिखाई दी। लंबे समय बाद सादगी पर ज़ोर दिया जा रहा है, ख़र्चों पर लगाम लगाने की सारी तरक़ीबें भिड़ाई जा रही है। इस बीच जनता के चुने नुमाइंदों ने अपने बे सिर पैर के बयानों से खुद के चुनाव को चुनौती भी दी, उन्होंने जता दिया कि भीड़ से अलग दिखने की हसरत उनसे कुछ भी कहलवा सकती है। ख़र्चों में कटौती के लिए सारे जतन, सारे दिखावे ज़ोरों पर हैं। पहली बार पूर्व सांसदों के दिल्ली के सरकारी आवासों पर भी नज़र टेढ़ी हुई, जो सरकारी दामाद बने मलाई काट रहे थे। वैसे ये बात और है कि इसमें वो भी नप गए जो अब भी सांसद हैं।
इधर, चुनावों की तैयारियां भी ज़ोर-शोर से जारी है, नए दोस्तों की तलाश पूरी हो चुकी अब दुश्मनों पर कीचड़ उछालने की बारी है। दिग्गजों से लेकर कलावती तक चुनावी समर में कूदने की तैयारी में हैं। त्योहारी जलसे पूरे हों तो लोकतंत्र के इस जलसे का भी लुत्फ़ उठाया जाएगा।
फ़िलहाल तो शुभकामनाएं त्योहारों की, आपको... आपके परिवार को।।
और हां, अबकि दीपावली एक दीया किसी और के सूने आंगन में ज़रूर जलाएं... एक फुलझड़ी किसी मासूम के खाली हाथ में ज़रूर दें।
Thursday, July 23, 2009
क्या सही हैं आप ???

कैसे हैं आप ? चलिए आज कुछ नई बात की जाए... मैं पुराना, आप पुराने, माहौल पुराना, सभी कुछ तो पुराना है फिर नया क्या कहा जाए ? नए की छोड़िए, कुछ पुराना ही सुनाइए, अजी पुराने में क्या रखा है... पुराना भी भला कभी बातचीत का मसला हुआ है ? फिर किस पर बात की जाए... अअअअअ$$$$$ अच्छा कभी आपको खुद के सही या ग़लत होने का एहसास हुआ है ? आपके सही की सही चर्चा न होना ये बताता है कि आप अक्सर सही होते हैं, और ये रूटीन में शामिल हो तो मान लीजिए कि आप सही हैं, ऐसा मैं मानता हूं। फिर ग़लत क्या है ….. सही की छोटी सी भी ग़लती, उसे ग़लत साबित कर देती है, आप समझ रहे हैं ना... दरअसल, हर किसी की एक इमेज होती है। उसी में सही और ग़लत छिपे होते हैं। बार-बार ग़लत होना, और उसे सही अंदाज़ में सही साबित करना हर किसी के बस में नहीं, ठीक वैसे ही हर बार सही होकर भी उसे सही साबित न कर पाना ग़लती के दायरे में शामिल हो जाता है। अरे ज़्यादा मत सोचिए, इस सही और ग़लत के बीच बड़ी महीन सी रेखा है... मुझे लगता है कि मैं हमेशा सही होता हूं, ये सही भी है, लेकिन वही ना... मैं खुद को सही तरीके से रख नहीं पाता, मैं ही नहीं.. मुझ जैसे कई हैं, जो दुनिया का सही जानते ही नहीं। ये सही थोड़े न, कि हर वो बात सही हो, जो आप सही सोच रहे हों, हो सकता है कि आपका सही सामने वाले को सही ना लगे। सही तो वो है तो सामने वाले को प्यारा लगे, और आपके दिल को झूठा। ठीक वैसे ही, आपको जो ग़लत लग रहा हो वो ग़लत नहीं भी हो सकता, दरअसल, ग़लत तो वो है जो सबको ग़लत लगे। आप एक के ग़लत महसूस कर लेने से क्या होना है।
अच्छा एक मज़ेदार बात, ग़लत के बारे में। ये जो ग़लत है ना... हर जगह है। हर बात में है, हर किसी में है, हम सब में है। हर चीज़ सामूहिक तौर पर मज़बूत होती है लेकिन ये ग़लत, कमबख़्त अकेला होने पर ही ताक़तवर होता है। हां मैं सही कह रहा हूं, फिर वही बात, सही बात जो ठहरी, कहा ना... अकेला सही खुद को साबित नहीं कर पाता, तो आप भी क्यों मानेंगे ?? सुनिए तो प्लीज़... आपको बात ग़लत तब ही लगती है जब वो आपके साथ होती है, औरों के साथ भी तो होती है... आप इग्नोर कर देते हैं, इसका एक हिस्सा भी आपके साथ हो जाए तो आप आसमान सर पर उठा लेते हैं... अजी आसमान छोड़िए, किसी के भी साथ ग़लत होने पर खुद के सही को ललकारिए, मज़ाल है कि ग़लत सर उठा सके। क्यों किसी का ग़लत आपके सही को दबा देता है, क्यों आपका सही उस ग़लत के आगे दुबक जाता है जिसका वजूद ही नहीं, क्यों किसी ग़लत के आगे आपके सही की सिसकियां दम तोड़ देती है ? अच्छा एक फॉर्मूला देता हूं, आज़माइएगा... अगर आपका सही हमेशा दबा रहा हो, हमेशा नकार दिया जा रहा हो, तो उसके कान में जाकर ये कहिएगा कि वो ग़लत है, वो झूठ बोल रहा है। आज़माइए तो सही... फिर देखिए इस सही की ताक़त, इस एक सही के पीछे पूरी दुनिया खड़ी दिखाई देगी, ये सही सब बर्दाश्त कर सकता है, लेकिन खुद को ग़लत की क़तार में खड़ा देखना... कतई नहीं। सही, इस सही को सही देखना बड़ा सही लगेगा।।
Friday, July 17, 2009
हर रंग मेरा...
जब से होश संभाला एक ही सवाल सुना कौन सा रंग पसंद है तुम्हे... कभी कहा लाल, कभी गुलाबी बताया, कभी तकलीफ़ में ये काला हो गया, कभी ग़ुस्से में ये लाल रहा। आप नहीं पूछेंगे कौन सा रंग पसंद है मुझे... पूछेंगे ना। मैं भी जवाब दूंगा... बदरंग हो गया हूं इन दिनों। बड़ा तल्ख़ सा जवाब दिया ना, ये तल्ख़ी यूं ही नहीं दोस्तों। आपको नहीं लगता कभी रंगों से भी पूछा जाए, क्या हम उन्हे पसंद हैं ? वैसे ना ही पूछे तो बेहतर है, अजी सही कहा हमने। हम तो हर रंग में रंगने का हुनर पाल बैठे है। अच्छा रंगों की भी कोई दुनिया होती होती होगी ना, उनमें भी कोई बड़ा होता होगा तो कोई छोटा, कोई अगड़ा होता होगा तो कोई पिछड़ा, कोई कहता होगा कि मैं बड़ा, दुबका पड़ा दूसरा कहता होगा, मैं भी कम नहीं। लाल कहता मुझे क्रांतियों ने स्वीकारा, सफेद कहता मुझे शांति ने आत्मसात किया, काला कहता मुझे शोक पर गर्व है, गुलाबी कहता मुझे इश्क़ पर नाज़ है। लड़ते तो ये भी होंगे... यक़ीनन लड़ते होंगे, झगड़ते होंगे रूठते होंगे, लेकिन मनाते भी होंगे। नहीं मनाते होंगे....? अरे मैं रंगों की बात कर रहा हूं, इंसानों की नहीं, यक़ीनी तौर पर ये एक दूसरे को मनाते होंगे। ‘नहीं मनाते होंगे’ बड़ा सवाल नहीं, मुद्दा तो मान जाना है। क्या इनमे ग़ैरत नहीं, अब भला ग़ैरत बीच में कहां से आ गई ?
ग़ैरत तो मुखौटा है, मसला तो रूहानी है।
सही कहा मैनें, आपने कोशिश ही नहीं की, मनाने की.... साहब, इस दफ़ा रंगों की नहीं इंसानों की बात कर रहा हूं। कभी कोशिश की बिछड़ों को वापस पाने की, नहीं ना ? कभी कोशिश की रूठों को मनाने की, नहीं ना ? आपको तो मलाल भी नहीं हुआ उनके दूर जाने का, है ना ? कभी सोचा आपने वो कहां हैं, किस तरह जी रहे हैं, हक़ीक़त के थपेड़ों ने कहीं उनके चेहरे पर शिकन तो नहीं छोड़ दी ? हालात की तपिश ने उनका लहज़ा तो नहीं बदल दिया ? जो भी हो... वो ख़ुश हों, बेहतर ज़िंदगी जी रहे हों। सच कहा साहब, वो ग़ुस्सा, वो तल्ख़ी पल भर की थी। तुम भी कैसे हो, तुम तो मेरे अपने थे, मेरे दोस्त थे, मेरे हमराज़ थे। तुम भी नहीं समझे, और मैं भी... तुम्हे समझा न सका। समझे... न सही, ग़ुस्सा... हां सही, नाराज़गी... जायज़ थी, लेकिन रिश्तों के दरक जाने का सबब तो पूछा होता। हक़ से कहा होता, ये सही नहीं। न तुमने पूछा, न हमने बताया। लेकिन हम तो एक रंग थे... मुझ बिन तुम अधूरे, तुम बिन मैं खाली-खाली।















